Thursday, November 21, 2019

चर्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम

लेकिन यह पहला मौक़ा नहीं है जब कोई मजलिस को 'वोट काटने वाली पार्टी' कह रहा है. ऐसा ही आरोप समाजवादी पार्टी ने तब लगाया था जब ओवैसी ने उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के दौरान अपनी पार्टी से उम्मीदवार उतारे थे. महाराष्ट्र में भी कांग्रेस और एनसीपी ऐसा आरोप लगाती रही हैं.
बीबीसी मराठी सेवा के संपादक आशीष दीक्षित कहते हैं कि एआईएमआईएम को अगर आगे बढ़ना है तो उसके लिए लिए वोट काटने के इस 'टैग' से पार पाना ज़रूरी है.
वह कहते हैं, "मुसलमानों के बीच 2014 के बाद यह फ़ीलिंग आई थी और कांग्रेस ने इस तरह का प्रचार भी किया था कि एमआईएम को वोट देने का मतलब है- बीजेपी को फ़ायदा पहुंचाना क्योंकि मुसलमान वोटरों के कांग्रेस से अलग होने का फ़ायदा बीजेपी को मिलता है. हर रैली में कांग्रेस ने यह बात कही."
असदुद्दीन ओवैसी वोट काटने के इस 'टैग' को
अब तक पश्चिम बंगाल में मजलिस ख़ास सक्रिय नहीं थी मगर धीरे-धीरे उसकी सक्रियता बढ़ रही है. ओवैसी ने भी राज्य के दौरे शुरू किए हैं. ओवैसी को यहां अपनी पार्टी की सफलता की उम्मीद तो होगी मगर सिर्फ़ मुसलमान वोटों के आधार पर सफलता पाना आसान नहीं होगा.
बीबीसी मराठी सेवा के संपादक आशीष दीक्षित इसके लिए महाराष्ट्र का उदाहरण देते हैं, "एमआईएम को सोचना होगा कि अगर मुसलमानों के मन में यह बात बैठ जाती है कि ओवैसी की पार्टी को वोट देने से बीजेपी को फ़ायदा होता है तो फिर मुश्किल होगी. वे एक ही हाल में एमआईएम को वोट दे सकते हैं जब वह पार्टी कमज़ोर हो जाए जिसे वे वोट देते रहे हैं. उदाहरण के लिए महाराष्ट्र में अब कांग्रेस और एनसीपी की स्थिति 2014 से मुक़ाबले बेहतर हुई है. तो मुसलमानों को अगर लगता है कि वे जीतने की बेहतर स्थिति में हैं तो आगे मजलिस के लिए महाराष्ट्र में चुनौती बढ़ जाएगी."
जिस शैली में ममता बनर्जी ने एआईएमआईएम पर निशाना साधा है, उसके आधार पर अगर वह यही बात पश्चिम बंगाल के मतदाताओं के मन में बिठाने में सफल हो जाती हैं तो ओवैसी को मुश्किल हो सकती है.
मगर अभी चुनावों में डेढ़ साल का समय है. सबकी निगाहें इस पर होंगी कि ओवैसी इस चुनौती पार करके तृणमूल कांग्रेस और बीजेपी के लिए चैलेंज बन पाते हैं या नहीं.
हटाने की कोशिश भी कर रहे हैं. वह कई बार कह चुके हैं कि लोकसभा चुनाव और अन्य राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों में उनकी पार्टी के उम्मीदवार नहीं थे, फिर भी बीजेपी विरोधी पार्टियों की हार हुई. इसलिए यह कहना ग़लत है कि एआईएमआईएम के कारण बीजेपी को फ़ायदा पहुंचता है.
ममता बनर्जी पर भी उन्होंने इसी लाइन पर निशाना साधते हुए सवाल पूछा है कि 2019 के लोकसभा चुनाव में मैंने पश्चिम बंगाल में उम्मीदवार नहीं उतारे थे, फिर बीजेपी को 18 सीटें कैसे मिल गईं?
वरिष्ठ पत्रकार उमर फ़ारूक़ कहते हैं, "वोट काटने के सवालों पर ओवैसी खुलकर कहते हैं कि सेक्युलर पार्टियां, जिनमें कांग्रेस भी शामिल है, वे अपने हिंदू सेक्युलर वोट बैंक को भी अपने साथ नहीं रख पाईं. वह कहते हैं कि इन पार्टियों को सिर्फ़ इस बात की चिंता है कि मुसलमान उन्हें वोट देते रहें. ओवैसी का सवाल है कि जब आप उन्हें अपने साथ नहीं रख पा रहे तो क्या मुसलमानों ने आपको लिखकर दे रखा है कि वो हमेशा आपको वोट देंगे?"

Tuesday, September 17, 2019

हाल के वक़्त में अमरीकी नोसैना ने अपने अभियानों में डॉलफिन का इस्तेमाल किया है.

कॉलेज के एक पूर्व छात्र रामजी अवस्थी बताते हैं, "इस लड़की की हिम्मत की तारीफ़ होनी चाहिए, वर्ना तो स्वामी चिन्मयानंद की ऐसी गतिविधियों को लेकर कॉलेज कैंपस से शहर भर में भला कौन परिचित नहीं है. युवा उनके ख़िलाफ़ अब सड़क पर उतरने की तैयारी कर रहे हैं और उन्हें गिरफ़्तार कराकर ही मानेंगे."
वहीं लेखक और पत्रकार अमित त्यागी इस मामले में दोनों पक्षों में से किसी को भी पाक-साफ़ नहीं मानते. वो कहते हैं, "दोनों पक्षों की ओर से जो वीडियो सामने आए हैं, उससे दोनों की ही गतिविधि गरिमापूर्ण नहीं कही जा सकती. इस पूरे प्रकरण में क़ानूनी पक्ष चाहे जिधर जाए, लेकिन दोनों ही स्थितियों में सामाजिकता और नैतिकता का क्षरण हो रहा है."
अमरीकी ख़ुफ़िया एजेंसी सीआईए ने शीत युद्ध के दौरान इस्तेमाल की गई ख़ुफ़िया तकनीक से पर्दा उठाया है.
सीआईए ने बताया है कि किस तरह वह कबूतरों को ट्रेनिंग देकर उन्हें जासूसी के लिए तैयार करता था.
कबूतरों को सिखाया जाता था कि वो सोवियत संघ के संवेदनशील इलाक़ों में पहुंचकर वहां गुप्त तरीक़े से तस्वीरें खींच सकें.
सीआईए ने यह भी बताया है कि कबूतरों को खिड़कियों के पास उपकरण रखने की ट्रेनिंग भी दी जाती थी. कबूतरों के अलावा डॉल्फिन का इस्तेमाल भी किया जाता था.
सीआईए का मानना है कि ये जानवर एजेंसी के खुफ़िया मिशन को सफ़ल करने में काफ़ी फायदेमंद साबित होते हैं.
वर्जिनिया में सीआईए का मुख्यालय है, उसके भीतर एक म्यूज़ियम भी है, जिसे अब आम जनता के लिए बंद कर दिया गया है.
मैंने एक बार उस म्यूज़ियम के तत्कालीन निदेशक का इंटरव्यू किया था और वहां बहुत सी हैरान करने वाली चीज़ें देखी थीं.
मैंने देखा था कि वहां एक कबूतर का मॉडल रखा था जिस पर एक कैमरा बांधा गया था.
मैं उन दिनों द्वितीय विश्व युद्ध से जुड़ी एक किताब लिख रहा था जिसके लिए मैं ब्रिटेन की ओर से कबूतरों के इस्तेमाल की जानकारी जुटा रहा था.
सीआईए के म्यूज़ियम में कबूतर के मॉडल पर बंधे कैमरे को देख मेरी दिलचस्पी बढ़ गई. उस समय उन्होंने इस बारे में मुझे ज़्यादा जानकारी नहीं दी थी.
1970 में हुए ऑपरेशन का कोड नाम 'टकाना' रखा गया था. इस अभियान में कबूतरों का इस्तेमाल तस्वीरें खींचने के लिए किया गया.
कबूतरों की एक ख़ासियत ये है कि उनकी याददाश्त बहुत अच्छी होती है. इसके साथ ही कबूतर बहुत ही आज्ञाकारी जीव भी है.
उन्हें किसी भी इलाक़े से उड़ाया जाए, वो मीलों की दूरी तय कर दोबारा घर लौट आने की कला जानते हैं. यही वजह थी कि सीआईए कबूतरों को गुप्त मिशन में इस्तेमाल करता था.
हालांकि, कबूतरों को पोस्टमैन के तौर पर इस्तेमाल करने की बात हज़ारों साल पहले से सुनने में आती है. लेकिन, उन्हें जासूसी के कामों में इस्तेमाल करने का पहला प्रयोग प्रथम विश्व युद्ध में देखने को मिला.
द्वितीय विश्व युद्ध में ब्रिटिश खुफ़िया विभाग की एक कम जानी मानी ब्रांच एमआई 14 (डी) ने खुफ़िया कबूतर सर्विस शुरू की थी.
इस सर्विस के दौरान कबूतरों को किसी डिब्बे में रखकर पैराशूट से बांधकर यूरोप के आसमान में छोड़ दिया जाता था. इन कबूतरों के साथ कुछ सवालों का पुलिंदा भी रखा होता था.
जानकारी के मुताबिक़, तकरीबन एक हज़ार से ज़्यादा कबूतर खुफ़िया जानकारी जुटाकर वापस लौट आए थे, इसमें वी1 रॉकेट को लॉन्च करने वाली जगह और जर्मन रेडार स्टेशन की जानकारी तक शामिल थी.
युद्ध के बाद ब्रिटेन के ख़ुफ़िया विभागों की संयुक्त कमिटी में 'कबूतरों की सब कमिटी' बनाई गई थी. इस कमिटी में शीत युद्ध के दौरान कबूतरों का और बेहतर तरीके से इस्तेमाल करने पर विचार किया गया था.
हालांकि, बाद में ब्रिटेन के अधिकतर अभियान बंद कर दिए गए थे लेकिन सीआईए ने कबूतरों की ताक़त को पहचानते हुए उसका बेहतर इस्तेमाल करने पर विचार किया.
ऑपरेशन टकाना के दौरान कई दूसरे जानवरों के इस्तेमाल के बारे में भी पता चलता है. फाइलों में बताया गया है कि सीआईए ने एक कौए को इस तरह ट्रेनिंग दी थी कि वह 40 ग्राम भार वाली वस्तु को किसी इमारत की खिड़की पर रख सकता था.
एक लाल लेज़र लाइट के ज़रिए टारगेट को मार्क किया जाता था और एक खास लैंप के ज़रिए पक्षी वापस आ जाता था. एक बार यूरोप में, सीआईए ने पक्षी के ज़रिए एक इमारत की खिड़की पर जासूसी उपकरण रखवाया था.
इसके साथ ही सीआईए यह भी देखता रहता था कि क्या विस्थापित होने वाले पक्षियों की मदद से यह पता लगाया जा सकता है कि सोवियत संघ केमिकल हथियारों का इस्तेमाल कर रहा है या नहीं.
इसी तरह की ट्रेनिंग कुत्तों को भी दी जाती थी. हालांकि, इस संबंध में अधिक जानकारी उपलब्ध नहीं है. एक पुरानी रिपोर्ट में बताया गया है कि 'अकाउस्टिक किट्टी' नामक ऑपरेशन में एक बिल्ली में ऐसा उपकरण लगाया गया था जो आवाज़ें सुन और रिकॉर्ड कर सकता था.
वहीं, 1960 की फ़ाइलें बताती हैं कि सीआईए ने दूसरे देशों के बंदरगाहों पर जासूसी के लिए डॉल्फिन का इस्तेमाल भी किया है. पश्चिमी फ़्लोरिडा में दुश्मन के जहाज़ पर हमले के लिए डॉल्फिन को तैयार किया गया था.
इसके साथ ही डॉल्फिन को यह भी सिखाया गया कि वह समुद्र में न्यूक्लियर पनडुब्बी का पता लगा सके या फिर रेडियोएक्टिव हथियारों की पहचान कर सके.
साल 1967 से सीआईए अपने तीन कार्यक्रमों पर 6 लाख डॉलर से ज़्यादा पैसा खर्च कर रही है. इसमें डॉल्फिंस, पक्षी, कुत्ते और बिल्लियों का इस्तेमाल शामिल है.
एक फ़ाइल में बताई गई जानकारी के मुताबिक, कनाडाई बाज़ों का इस्तेमाल भी खुफ़िया जानकारी जुटाने के लिए किया जाता था. इससे पहले कोकाटू (तोते की एक प्रजाति) का इस्तेमाल होता था.
लेखक इस बारे में बताते हैं, ''पूरी तरह से अंधेरे में होने वाले अभियानों में ये जीव कारगर साबित होते थे.''
सीआईए ने अपने अभियानों के लिए बहुत से जानवरों का इस्तेमाल किया. उसने पाया कि इन सभी में कबूतर सबसे ज़्यादा प्रभावी जीव है.
इसी वजह से 1970 के मध्य में सीआईए ने कबूतरों से जुड़ी एक सिरीज़ शुरू कर दी. कबूतरों को दूसरे अभियानों मे भी इस्तेमाल किया जाने लगा. जैसे, एक कबूतर को जेल के ऊपर तैनात कर दिया तो दूसरे को वॉशिंगटन डीसी में नौसेना के बाड़े में.
इन अभियानों में इस्तेमाल होने वाले कैमरों की कीमत दो हज़ार डॉलर तक आती थी जिसका वज़न सिर्फ़ 35 ग्राम होता था, वहीं कबूतर से बांधने के लिए जिस चीज़ का प्रयोग होता था उसका वज़न तो 5 ग्राम से भी कम था.
टेस्ट में पता चला है कि कबूतरों ने नौसेना के बाड़े से 140 तस्वीरें प्राप्त की, जिसमें से आधी तस्वीरें अच्छी क्वालिटी की थीं. इन तस्वीरों में गाड़ियां और इंसान बहुत साफ देखे जा सकते थे.
विशेषज्ञों ने यह भी पाया कि उसी दौरान जो तस्वीरें खुफ़िया सैटेलाइट ने मुहैया करवाई थीं उनकी क्वालिटी इनके सामने बहुत अच्छी नहीं थी.

Friday, July 5, 2019

चर्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम

पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में 'तहरीक-ए-लब्बैक पाकिस्तान' के धरने के ख़िलाफ़ स्वतः संज्ञान नोटिस के फैसले ने सिविल ऑर्गनाइज़ेशन के साथ सैन्य संगठनों को भी कटघरे में खड़ा कर दिया.
तहरीक-ए-लब्बैक ने इस्लामाबाद और रावलपिंडी के संगम पर स्थित फ़ैज़ाबाद इंटरचेंज पर चुनावी हलफ़नामे में 'ख़त्म-ए-नबूव्वत' के हवाले से विवादित संशोधन के ख़िलाफ़ नवम्बर 2017 में धरना दिया था जो क़ानून मंत्री ज़ाहिद हामिद के इस्तीफ़े के बाद समाप्त हुआ था.
जस्टिस क़ाज़ी फ़ाएज़ ईसा और जस्टिस मुशीर आलम की दो सदस्यी बेंच ने अपने फ़ैसले में सरकार को आदेश दिया है कि वो ऐसे फौजी अधिकारियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई करे जिन्होंने अपनी शपथ का उल्लंघन करते हुए राजनीतिक गतिविधियों में हिस्सा लिया था.
अदालत ने आर्मी चीफ़, और नौसेना और वायु सेना बल के अध्यक्षों को रक्षा मंत्रालय के माध्यम से आदेश दिया कि वो फौज के उन अधिकारियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई करें जिन्होंने अपनी शपथ को दरकिनार करते हुए किसी राजनीतिक दल या गुट का समर्थन किया था.
अदालत ने आईएसआई, मिलिट्री इंटेलीजेंस और इंटेलीजेंस ब्यूरो के अलावा पाकिस्तानी फौज के जनसंपर्क विभाग को भी हिदायत की है कि वो अपने दायरे में रहते हुए काम करें.
फ़ैज़ाबाद धरने के फ़ैसले पर जस्टिस फ़ाएज़ ईसा के समर्थन और विरोध पर वकील समुदाय बँट गया.
इस फ़ैसले पर पंजाब बार काउंसिल ने नाराज़गी का इज़हार करते हुए इन्हें हटाने की मांग की.
पंजाब बार काउंसिल ने आरोप लगाया कि जस्टिस क़ाज़ी फ़ाएज़ ईसा ने फ़ैज़ाबाद धरना केस का फ़ैसला सुनाते हुए क़ानून के बुनियादी उसूलों का उल्लंघन किया है.
बार काउंसिल का ये भी दावा था कि पाकिस्तान की फ़ौज और आईएसआई ने देश के अस्तित्व और स्थिरता के ख़ातिर चरमपंथ के ख़िलाफ़ कामयाब जंग करते हुए शहरियों की जान व माल को महफ़ूज़ करने का कारनामा अंजाम दिया है.
मगर जस्टिस फ़ाएज़ ईसा ने फौज और आईएसआई के उस महान चरित्र की तारीफ़ करने के बजाय राष्ट्रीय सुरक्षा के सिक्योरिटी एजेंसियों को बग़ैर किसी सबूत के दोषी ठहरा कर मुल्क की दुश्मन ताक़तों को पाकिस्तान की रक्षा एजेंसियों के ख़िलाफ़ प्रोपेगैंडा करने का अवसर उपलब्ध करा दिया है.
पंजाब बार काउंसिल के मांग की सिंध बार काउंसिल, हाई कोर्ट बार, कराची और मलेर बार ने निंदा की और जस्टिस क़ाज़ी फ़ाएज़ ईसा के हक़ में संकल्प पत्र मंज़ूर किया.
सिंध की बार काउंसिल ने संयुक्त संकल्प पत्र में कहा कि कुछ अनोखी ताक़तें अदालत को दबाव में लाना चाहती हैं. पंजाब बार कठपुतलियों की भी कठपुतली का किरदार अदा कर रही है जबकि सिंध का तमाम वकील समुदाय इस सैधांतिक राय के साथ खड़ा है.
पाकिस्तान बार काउंसिल ने भी पंजाब बार काउंसिल की मांग को खारिज किया और क़रार दिया कि किसी भी संस्था को अदालत की आज़ादी का खून करने की इजाज़त नहीं देंगे.
देश के मशहूर वकील और पूर्व जज जस्टिस रशीद ए रिज़वी का कहना है कि अगर जस्टिस क़ाज़ी फ़ाएज़ ईसा को हटाया गया तो 2007 से भी बड़ी तहरीक चलाई जाएगी. याद रहे कि वो तहरीक जस्टिस इफ़्तिख़ार मोहम्मद चौधरी की बहाली के लिए चलाई गई थी.
स्पष्ट रहे कि जस्टिस क़ाज़ी फ़ाएज़ ईसा ने सदर पाकिस्तान को एक पत्र लिखा है, जिसमें उन्होंने लिखा है कि उनकी जानकारी के मुताबिक़ सराकारी सूत्र कह रहे हैं कि उनके ख़िलाफ़ संविधान के आर्टिकल 209 के तहत रेफ्रेंस दायर किया गया है.
"मैं शुक्रगुज़ार रहूंगा अगर आप मुझे बता सकें कि क्या ये दुरूस्त है और अगर ऐसा है तो मुझे उसकी कॉपी उपलब्ध कराई जाए."

Tuesday, July 2, 2019

生物多样性谈判:“巴黎热”中的冷思考

2020年中国将作为主席国举办《生物多样性公约》第十五次缔约方大会(CBD-COP15),力求达成全球生物多样性后2020年框架。在通往昆明的道路上,借鉴《巴黎协定》经验已成为目前谈判中的趋势。《巴黎协定》作为新一代多边环境条约的历史地位,及其对其它环境进程的参考价值毋庸置疑。然而,在现阶段的谈判中,已然出现了一些对“巴黎精髓”的曲解。如不多加注意,有可能导致生物多样性进程仅仅学到了巴黎之“表”,而不能汲取其“里”。

《巴黎协定》对生物多样性进程的参照应该至少表现在四个层面

首先,《巴黎协定》为多边气候治理带来的不是小修小补,而是一次范式革新。《巴黎协定》汲取了既往“自上而下”和“自下而上”模式的优势与不足,创新性地将全球长期目标、规则手册等“自上而下”的元素与“国家自主贡献(NDC)”的“自下而上”概念结合。在地缘政治深刻变化的当下,《巴黎协定》的执行情况还有待实践的检验。但应当承认,它赋予了国际气候治理格局一次重生

2020年的昆明会议对于生物多样性进程的历史意义,类似于当年的巴黎气候大会,应当留下与之相匹配的政治遗产。这一遗产不应该局限于政治“化妆”,而应触及问题的根源,对生物多样性保护的症结开展有效的“手术”。在这一点上,生物多样性进程并非没有前车之鉴。2010年的“爱知目标”外表光鲜,但各国对这一国际目标却没有义务进行相应的“国内化”(通过国内的立法和政策制定使目标“落地”)。这无疑注定了“爱知目标”更多只是“愿景”,而无法被全面达成的宿命。让生物多样性进程在2020年之后获得如巴黎一样的“重启”应是昆明会议的重要使命。

其次,《巴黎协定》的重要政治贡献在于目标和机制的“双核”推动。在目标方面,《巴黎协定》在一定程度上冲破了政治束缚,第一次将雄心勃勃的1.5度温控目标写入多边进程。这在一定程度上是主席国政治魄力和各方外交努力的成果。在机制方面,《巴黎协定》也取得了摆脱旧有的发达国家-发展中国家二元对立的政治突破,并显著提升和丰富了多边机制中围绕“自主贡献”信息、透明度、适应、资金、力度提升机制、履约等各方面的规则

现阶段生物多样性谈判则有一种“重目标、轻机制”的倾向,过多的精力被用于设计目标的形式和结构,而对目标力度和涵盖议题(比如是否包含量化资金目标)的讨论还处在表层。在机制方面,各方还没有对后2020框架需要哪些机制进行有效、务实的甄别。更危险的是,各方在尚未清晰界定后2020年框架所包含的要素前就急于进入关于要素之间层级和结构的讨论,这与先定内容,再议结构的常规逻辑背道而驰。与巴黎目标、机制的“双赢”相比,昆明会议需要谨慎安排这两方面的讨论,防止既无法产出超越政治想象的目标,又在机制、资金等问题上裹足不前的情况。

第三,《巴黎协定》的谈判虽然不乏波澜,但对程序性问题的管控总体得当。多边进程中,程序性议题往往是决定进程成败的关键。目前阶段,生物多样性进程已经出现了一些程序性隐患,亟待解决。例如,《生物多样性公约》试图复制《巴黎协定》中“自主贡献”的概念,在2018年的第十四次缔约方大会(CBD-COP14)决议中采纳了“自愿承诺(voluntary commitment)”的概念。但《巴黎协定》在提出“自主贡献”概念后对其进行了缜密定义,才最终要求各国提交贡献。而《生物多样性公约》在没有对“自愿承诺”由谁提交、何时提交、包含内容等关键问题进行详细讨论并形成共识前,就植入了这一概念。更令人忧虑的是,作为国家执行公约的政策工具,生物多样性进程下已有“国家生物多样性战略与行动计划(NBSAP)”。在没有充分定义的情况下抛掷出“自愿承诺”概念,不仅不会健全公约的执行机制,反而可能产生不必要的误解。同时,如果没有足量国家认同“自愿承诺”的概念,昆明会议也可能面临甚少“自愿承诺”被提交的“冷场”。最后,“从沙姆沙伊赫到昆明行动议程”与“自愿承诺”的关系也不甚清晰。如若二者为同一概念,那么目前为二者制定的条款并不统一,容易引起误解。如若二者为不同概念,那么用两个概念为昆明大会造势这一共同愿景服务则显冗余

第四,《巴黎协定》的影响力还来自主席国对其遗产的长期推动。《巴黎协定》诞生伊始就面临使条约迅速生效、美国撤约、完成规则手册谈判等重要考验。法国作为第二十一次缔约方大会主席在条约达成后付出了延续性的政治努力,在国际气候进程遭受到挑战甚至挫折的情况下为《巴黎协定》注入了关键的政治韧性。

重大多边协定的达成如同育儿,决议呱呱坠地往往只是漫长育儿过程的起点。中国应该就会议成果和会后进程做好筹划。生物多样性进程中的很多问题积累多年,不能指望昆明会议一蹴而就、解决百病。因此,会后的“售后服务”应该与会议成果设计得到同等重视。主席国也应为此问题预留长期、充足的政治资源。

综上,各方对《巴黎协定》的价值及其对《生物多样性公约》的借鉴意义应该有全面、精确的理解。不对症下药,而仅进行“复制-粘贴”式的仿效将事倍功半。中国作为昆明会议主席国,应将会议定位在针对生物多样性进程进行巴黎式的范式革新。这是对环境外交的一次考验,但也是昆明成果历久弥坚的根基。

Tuesday, June 25, 2019

चर्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम

अभी ऑस्ट्रेलिया, भारत और न्यूज़ीलैंड के ख़िलाफ़ मैच खेलने बाकी. सेमीफ़ाइनल में पहुँचने के लिए दो मैच जीतने ही होंगे.
(लेकिन अगर अंग्रेज़ टीम बाकी तीनों में से एक भी मैच नहीं जीत पाई तो.....इंग्लैंड के आठ ही अंक रह जाएंगे और वो टूर्नामेंट से बाहर होने के कगार पर होगी. लेकिन कुछ अगर-मगर उसे सेमीफ़ाइनल में पहुँचा सकते हैं.
और अब बात पाकिस्तान की. 1992 में स्लो स्टार्टर रहने के बाद चैंपियन बनने वाली पाकिस्तान टीम अब भी चैंपियन बनने का ख्वाब देख सकती है.
पाकिस्तान छह मैचों में दो जीत के साथ पाँच अंक लेकर सातवें नंबर पर है. दक्षिण अफ्रीका को 49 रन से हराकर टीम ने टूर्नामेंट में वापसी की संकेत दिए हैं.
न्यूज़ीलैंड, अफ़ग़ानिस्तान और बांग्लादेश के ख़िलाफ़ मैच बाकी. सेमीफ़ाइनल में पहुँचने के लिए पाकिस्तान को तीनों मैच जीतने होंगे. इससे पाकिस्तान के 11 अंक हो जाएंगे, लेकिन इसके बाद भी कुछ अगर-मगर बने रहेंगे.
सरफ़राज़ एंड कंपनी को अंतिम चार में जगह पक्की करने के लिए उम्मीद करनी होगी कि इंग्लैंड एक से अधिक मैच न जीते. इसके अलावा श्रीलंका और बांग्लादेश कम से कम एक-एक मुक़ाबला हार जाएं.
तो अगर भारत और पाकिस्तान सेमीफ़ाइनल में पहुँचे तो 9 जुलाई को मैनचेस्टर में होने वाले पहले सेमीफ़ाइनल में या 11 जुलाई को बर्मिंघम में होने वाले दूसरे सेमीफ़ाइनल में टकरा सकते हैं, लेकिन इसके लिए भी अभी काफी अगर-मगर बाकी हैं.
फ़ाइनल मुक़ाबला लंदन में 14 जुलाई को खेला जाएगा.
नए दौर का रहन-सहन सिर्फ़ हमारी ज़िंदगी पर कई तरह से असर नहीं डाल रहा.
बल्कि ये हमारे शरीर की बनावट में भी बदलाव ला रहा है.
नई रिसर्च बताती है कि बहुत से लोगों की खोपड़ी के पिछले हिस्से में एक कीलनुमा उभार पैदा हो रहा है और कुहनी की हड्डी कमज़ोर हो रही है. शरीर की हड्डियों में ये बदलाव चौंकाने वाले हैं.
हर इंसान के शरीर का ढांचा उसके डीएनए के मुताबिक़ तैयार होता है. लेकिन, जीवन जीने के तरीक़े के साथ-साथ उसमें बदलाव भी होने लगते हैं.
शोधकर्ता हड्डियों की बायोग्राफ़ी को ऑस्टियो बायोग्राफ़ी कहते हैं. इसमें हड्डियों के ढांचे को देखकर पता लगाने की कोशिश की जाती है कि उस शरीर का मालिक किस तरह की ज़िंदगी जीता था.
वो कैसे चलता, बैठता और लेटता और खड़ा होता था.
ये इस मान्यता पर आधारित है कि हम जैसी लाइफ़-स्टाइल अपनाते हैं, शरीर उसी तरह आकार लेने लगता है.
रिसर्च में पाया गया है कि यहां के नौजवानों की कुहनियां पहले के मुक़ाबले पतली होने लगी हैं. इससे साफ़ ज़ाहिर है कि नई जीवनशैली हमारे शरीर की बनावट खासतौर से हड्डियों पर अपना असर डाल रही है.
साल 1924 में मारियाना और गुआम द्वीप में खुदाई के दौरान विशालकाय आदमियों के कंकाल मिले थे. ये कंकाल सोलहवीं और सत्रहवीं सदी के बताए जाते हैं.
इनमें खोपड़ी, बांह की हड्डी, हंसली (कंधे की हड्डी का एक भाग) और टांगों के निचले हिस्से की हड्डियां काफ़ी मज़बूत हैं.
इससे पता चलता है कि उस दौर में यहां के लोगों आज के इंसान से अलग थे.
इस द्वीप की पौराणिक कहानियों में ताऊ ताऊ ताग्गा का ज़िक्र मिलता है. वो बेपनाह जिस्मानी ताक़त वाला पौराणिक किरदार था. लेकिन सवाल है कि आख़िर वो इतने ताक़तवर क्यों था?
दरअसल जिस इलाक़े में ये कंकाल पाए गए थे, वहां लोग पत्थरों का काम करते थे.
बड़ी-बड़ी चट्टानों को तोड़कर अपने घर बनाते थे. इस द्वीप के सबसे बड़े घर में 16 फुट के खंभे लगे थे, जिनका वज़न 13 टन होता था.
उस दौर में आज की तरह की मशीनें नहीं थीं. इसलिए यहां के लोगों को कड़ी मेहनत करनी पड़ती थी. इस ज़रूरत के लिहाज़ से ही उनके शरीर की हड्डियां भी मज़बूत होती गईं.
अगर उस दौर की तुलना 2019 की मॉडर्न ज़िंदगी से की जाए तो हमारा शरीर बहुत कमज़ोर है. ये जीने के नए अंदाज़ का नतीजा है. आज हर कोई गर्दन झुकाए मोबाइल की स्क्रीन को ताकते हुए नज़र आता है.
ऑस्ट्रेलिया के वैज्ञानिक डेविड शाहर इंसान के शरीर में आ रही बनावट पर पिछले बीस साल से रिसर्च कर रहे हैं.
पिछले एक दशक में उन्होंने पाया है कि मरीज़ों की खोपड़ी में एक कील के आकार वाली हड्डी पनप रही है.
इसे साइंस की भाषा में एक्सटर्नल ऑक्सीपीटल प्रोट्यूबरेंस कहते हैं. ये खोपड़ी के निचले हिस्से में गर्दन से ठीक ऊपर होती है. सिर पर हाथ फेरने से इसे महसूस किया जा सकता है. अगर सिर पर बाल ना हों तो ये यूं भी साफ़ तौर पर नज़र आ जाती है.
हाल के दशक से पहले इंसानी खोपड़ी में कीलनुमा ये हड्डी किसी-किसी में पाई जाती थी. सबसे पहले ये 1885 में पाई गई थी. उस वक़्त फ्रांस के मशहूर वैज्ञानिक पॉल ब्रोका के लिए भी ये एक नई खोज थी. क्योंकि वो बहुत तरह की प्रजातियों पर रिसर्च कर चुके थे. उन्हें किसी में भी इस तरह की हड्डी नहीं मिली थी..
डेविड शाहर ने 18 से 86 वर्ष के क़रीब एक हज़ार लोगों की खोपड़ी के एक्स-रे पर रिसर्च की. उन्होंने पाया कि 18 से 30 वर्ष की उम्र वालों की खोपड़ी में कीलनुमा हड्डी या स्पाइक ज़्यादा थी.
शाहर के मुताबिक़ इसकी वजह गैजेट्स और स्मार्ट फ़ोन का इस्तेमाल है. जब हम किसी गैजेट पर नज़र जमाकर काम करते हैं तो गर्दन नीचे की तरफ़ झुक जाती है. जिसकी वजह से गर्दन की मांसपेशियों पर ज़ोर पड़ता है और दर्द बैलेंस करने के लिए एक नई तरह की हड्डी पैदा हो जाती है.
शाहर का कहना है कि कूबड़ अंदाज़ में बैठने की वजह से खोपड़ी में इस तरह की हड्डी पनप रही है. गैजेट्स के वजूद में आने से पहले अमरीका में औसतन हर कोई लगभग दो घंटे किताब पढ़ने में बिताता था लेकिन आज उसका दोगुना समय लोग अपने फ़ोन और सोशल मीडिया पर बिताते हैं.
स्पाइक के संदर्भ में सबसे हालिया रिसर्च 2012 में भारत की ऑस्टियोलॉजिकल लैब में हुई है. इस लैब में सिर्फ़ हड्डियों पर रिसर्च होती है.
यहां की रिसर्च में स्पाइक की लंबाई महज़ 8 मिलीमीटर है जबकि शाहर की रिसर्च में इसकी लंबाई 30 मिलीमीटर तक पायी गई है. शाहर के मुताबिक़ खोपड़ी में उठने वाला ये कूबड़ कभी जाने वाला नहीं है. बल्कि ये बढ़ता ही चला जाएगा. लेकिन इससे कोई और परेशानी भी नहीं होगी.
जर्मनी में एक अलग ही तरह की रिसर्च सामने आई है. क्रिश्चियन शैफ़लर का कहना है कि जर्मनी में नई पीढ़ी के बच्चों का शरीर लगातार कमज़ोर होता जा रहा है. ख़ास तौर से कुहनियां बहुत पतली और नाज़ुक हो रही हैं. पहले तो इसे वंशानुगत माना गया. फिर इसकी वजह कुपोषण समझी गई. लेकिन जर्मनी में इसकी गुंजाइश नहीं है. अब इसकी वजह आधुनिक जीवनशैली मानी जा रही है.
जब बच्चे ज़्यादा शारीरिक मेहनत का काम करते हैं तो उनकी मांसपेशियां और हड्डियों के नए ऊतक बनते हैं. जिससे शरीर मज़बूत होता रहता है. लेकिन नई लाइफ़-स्टाइल में बच्चे कसरत करते ही नहीं जिसका असर उनके शरीर पर पड़ रहा है.
इंसान के विकास का इतिहास बताता है कि वो एक दिन में 30 किलोमीटर तक पैदल चल सकता है. लेकिन आज के बच्चे 30 मीटर भी पैदल नहीं चलना चाहते. हमारे शरीर में ये बदलाव हो सकता है बहुत लंबे समय से चल रहे हों, बस इनका अदाज़ा हमें मौजूदा समय में हुआ है.
जबड़े को देखकर इंसान के खान-पान का पता लगाया जा सकता है. क्योंकि जबड़े पर जिस तरह का दबाव पड़ता है उसी अनुपात में नई मांसपेशियां और हड्डी के ऊतक बनने लगते हैं.
आज के दौर के बच्चों के जबड़े भी मज़बूत नहीं हैं. क्योंकि आज ऐसे खाने उपलब्ध हैं जिन्हें बहुत ज़्यादा चबाने की ज़रूरत नहीं है. और खाना भी वो इतना गला हुआ खाते हैं कि जबड़े पर ज़ोर ही नहीं पड़ता. बहुत से लोग तो लिक्विड डाइट ही लेते हैं. इसीलिए आज दांतों की समस्या भी आम होती जा रही है.
सिक्के के दो पहलू की तरह आधुनिक जीवनशैली के फ़ायदे और नुक़सान दोनों हैं. ये हमें तय करना है कि हमारा भला किसमें है.
आधुनिक जीवनशैली ने हमारी ज़िंदगी को बहुत आसान और तरक्क़ी वाला बनाया है. लेकिन अपनी ग़लत आदतों की वजह से हम ख़ुद अपने लिए मुश्किल खड़ी कर रहे हैं. अब फ़ैसला आपको करना है.

Monday, June 10, 2019

#السودان: انتشار لهاشتاغ #العصيان_المدني_الشامل، والمغتربون يلعبون دورا مهما في ظل انقطاع الانترنت

وتأتي الدعوة في سلسلة من الاحتجاجات والاعتصامات الهادفة إلى دفع المجلس العسكري إلى نقل السلطة إلى المدنيين.
وظهر هاشتاغ #العصيان_المدني_الشامل في قائمة أكثر الهاشتاغات تداولا في عدد من البلدان العربية صباح الأحد.
وخلال أربع وعشرين ساعة فقط ورد على الهاشتاغ أكثر من 150 ألف تغريدة.
وبتحليل انتشار الهاشتاغ من خلال النظر إلى البلاد التي ساعدت على انتشاره بهذا الحجم يبدو أن عددا من دول الخليج بالإضافة إلى مصر لعبت دورا في انتشاره.
توفي لاعب كرة القدم السوري عبد الباسط الساروت، الذي أصبح رمزا للانتفاضة ضد نظام الرئيس بشار الأسد، متأثرا بجراحه التي أصيب بها، في اشتباكات بين قوات المعارضة المسلحة والقوات النظامية، شمال غربي سوريا.
ومات الساروت، البالغ من العمر 27 عاما، في محافظة حماة، وفقا للفصيل المسلح الذي ينتمي إليه.
وكان ساروت حارس مرمى واعدا في منتخب بلاده للشباب ونادي الكرامة السوري. وبرز في مدينة حمص مسقط رأسه في عام 2011، كواحد من بين كثيرين انضموا للاحتجاجات في الشوارع.
وكان الساروت قد نجا من حصار حكومي قاس على حمص، رغم أن العديد من أفراد عائلته قتل هناك.
وتجسد قصة الساروت من عدة نواح مسار الثورة السورية بدءا من الأيام الأولى المليئة بالأمل وصولا إلى مرحلة حرب الاستنزاف القاتمة، والتي استطاع خلالها الأسد الحفاظ على موقعه في السلطة، وذلك حسبما يقول سيباستيان آشر الصحفي في بي بي سي.
كان الساروت يبلغ من العمر 19 عاما، حين اندلعت الانتفاضة السلمية ضد نظام الأسد عام 2011.
وبشعره الطويل وصوته العذب الذي غنى في مدح الثورة، سرعان ما أصبح الساروت رمزا لتلك المرحلة السلمية الأولى من الانتفاضة.
ووقف الساروت جنبا إلى جنب مع أيقونة أخرى للانتفاضة، وهي الممثلة الراحلة فدوى سليمان، التي كانت صوتا متمردا ضمن الأقلية العلوية، التي ينتمي إليها الرئيس الأسد.
لكن الساروت حمل السلاح حين وجهت الحكومة قوتها النارية المدمرة الكاملة ضد حمص.
كان الساروت بطل الفيلم الوثائقي "العودة إلى حمص" الذي جسد تحوله من رياضي موهوب إلى مقاتل متمرد.
ومن وجهة نظر مؤيدي نظام الأسد، فإن الساروت مجرد إرهابي آخر ودليل على ادعاء الحكومة بأنها كانت تقاتل طوال الوقت تمردا جهاديا مسلحا.
وكانت شائعات قد ترددت بأن الساروت تعهد بالولاء لتنظيم الدولة الإسلامية.
لكنه أنكر ذلك. غير أنه اعترف بأنه فكر في الأمر، عندما بدا التنظيم القوة الوحيدة القادرة على محاربة نظام الأسد، وهو الأمر الذي يدلل على كيفية تفكك قضية المعارضة السورية.
ومن المفارقة أن الساروت مات وهو يقاتل دفاعا عن آخر معقل للمعارضة في سوريا، وهي محافظة حماة التي تهيمن عليها جماعة جهادية، ألقت القبض عليه في عام 2017 للاحتجاج على حكمها للمنطقة.
تصاعدت حدة التوتر بين تركيا والولايات المتحدة بعد تزايد ضغط واشنطن على أنقرة بسبب شرائها منظومة دفاع صاروخي روسية.
وشدد باتريك شاناهان، القائم بأعمال وزير الدفاع الأمريكي في رسالة لنظيره التركي، خلوصي أكار، على الوقف الفوري لأي تدريب جديد لطيارين أتراك على مقاتلات إف-35.
وقد أعطت الولايات المتحدة مهلة لتركيا حتى نهاية شهر يوليو/ تموز المقبل، للتخلي عن شراء صفقة كبيرة من منظومة صواريخ إس-400 الروسية.
وترى واشنطن أن شراء تركيا منظومة إس-400 الدفاعية الروسية يشكل تهديدا لمقاتلات إف-35 الأمريكية التي تعتزم تركيا شراءها أيضا، وتقول إن أنقرة لا يمكنها الحصول على المنظومتين معا.
وقالت وكيلة وزارة الدفاع الأمريكية، ألين لورد: "إذا لم تلغ تركيا بحلول 31 يوليو/ تموز شراء نظام إس-400، سيتوقف تدريب الطيارين الأتراك في الولايات المتحدة على طائرات إف-35(الشبح)، وستلغى الاتفاقات مع الشركات التركية المتعاقد معها لتصنيع أجزاء الطائرة الحربية إف-35".
وبررت الولايات المتحدة إنذارها لشريكتها في حلف الناتو، بأن تركيا قد أرسلت بالفعل أفرادا إلى روسيا لبدء التدريب على منظومة إس-400.
وكان الرئيس التركي، رجب طيب أردوغان، قد أكد الثلاثاء الماضي أن بلاده "مصممة" على المضي قدما في الصفقة الروسية.
وقال أردوغان إنه أبلغ الولايات المتحدة أن أنقرة ستتخذ خطوات لشراء صواريخ باتريوت فقط إذا كانت شروط التسليم في واشنطن إيجابية مثل شروط موسكو.
وأضاف "للأسف لم نتلق اقتراحا إيجابيا من الجانب الأمريكي حول باتريوت يماثل العرض الروسي على منظومة إس-400".
صُممت مقاتلات إف-35 للعمل بشكل متوافق مع الأنظمة العسكرية لحلف الناتو، بما في ذلك الدفاعات المضادة للصواريخ، وهذا ما يثير مخاوف الولايات المتحدة من أن روسيا قد تضبط قدرات منظومتها إس-400 ضد التحالف الغربي من خلال المعلومات التي تحصل عليها في تركيا.
وسلمت الولايات المتحدة في يونيو/ حزيران عام 2018 أربع طائرات من طراز إف-35 إلى تركيا، لكنها أبقتها في الولايات المتحدة، لتدريب الطيارين الأتراك.
وإذا لم تتخل تركيا عن الصفقة مع روسيا بحلول 31 يوليو/ تموز المقبل، فإن الشركات التركية، التي تصنع 937 جزءا مختلفا من طراز إف-35 لن تُمنح أي عقود فرعية أخرى، وستجّير العقود لصالح شركات أخرى، وفقا لإلين لورد.
وقالت لورد إن شركة، لوكهيد مارتن، العملاقة للملاحة الجوية وشركة تصنيع المحركات، برات آند ويتني، قد بدأتا بالفعل في البحث عن موردين جدد، لتغطية الأجزاء التي تصنع حاليا في تركيا.
وأضافت أن الشركات التركية تنتهي مشاركتها في أوائل عام 2020، وقالت "لا يزال أمام تركيا خيار تغيير المسار".
ويعد برنامج مقاتلات إف-35 الذي أطلق في التسعينيات من القرن الماضي، أغلى برنامج في تاريخ الجيش الأمريكي، ويقدر البنتاغون تكلفته بنحو 400 مليار دولار، بهدف تصنيع ما يقرب من 2500 طائرة في العقود القادمة.

Monday, May 20, 2019

هل تسفر أزمة الولايات المتحدة وإيران عن تشكيل "ناتو عربي"؟

وتقول شينوويث إن هناك أشكالا أخرى للمقاومة السلمية لا تنطوي على مخاطر مادية، ولا سيما مع زيادة أعداد المشاركين، فضلا عن أن فعالياتها تحدث على مرأى من عدد أكبر من الناس ومن السهل أن يعرفوا سبل المشاركة فيها وتنسيق أنشطتهم لإثارة أقصى حد من الاضطرابات والتعطيل للخدمات العامة.
بالرغم من ارتفاع فرص نجاح الثورات السلمية، إلا أن 47 في المئة منها أخفقت في تحقيق أهدافها، وعزت شينوويث وستيفان في كتابهما ذلك إلى أن بعض المسيرات السلمية لم تلق صدى بين الناس للوقوف في وجه الطغيان. لكن بعض المسيرات السملية الكبرى أيضا لم تحقق أهدافها، مثل الاحتجاجات ضد الحزب الشيوعي في ألمانيا الشرقية في الخمسينيات من القرن الماضي التي استقطبت اثنين في المئة من عدد السكان.
لكن بيانات شينوويث تؤكد أن مشاركة 3.5 في المئة من عدد السكان بشكل فعال هي قاعدة لا تخيب لضمان نجاح الحراك السلمي، لكن الحفاظ على هذا النوع من المشاركة الفعالة مرهون بمدى سلمية الاحتجاجات.
ولاقت نتائج دراسات شينوويث وستيفان اهتماما كبيرا، منذ نشرها في عام 2011. وتقول إيزابيل برامسين، التي تدرس النزاع الدولي في جامعة كوبنهاغن، إن نتائج الدراسة مثيرة للاهتمام. وبينما تمثل نسبة 3.5 في المئة قلة من الشعب، إلا أن هذا المستوى من المشاركة الفعالة يدل على أن شرائح أكبر من الشعب تؤيد أهدافها ضمنيا.
أما عن العوامل التي تقود إلى نجاح الحراك أو فشله، فتنبه برامسين إلى أهمية انسجام المحتجين وتوحدهم. وتضرب مثالا على ذلك باحتجاجات البحرين في عام 2011، التي شاركت فيها أعداد كبيرة من المتظاهرين، ثم سرعان ما انقسموا إلى فصائل متنافسة. وترى برامسين أن حالة التشرذم والتصدع التي آلت إليها حركة الاحتجاجات في البحرين حالت دون استقطاب التأييد الشعبي اللازم لإحداث التغيير.
وتأمل شينوويث أن تولي كتب التاريخ المزيد من الاهتمام بالحراك الشعبي السلمي بدلا من تركيزها على الحروب. وتقول: "الكثير من القصص التاريخية التي نتناقلها تدور حول العنف"، في حين أننا نتجاهل النجاح الذي حققته الاحتجاجات السلمية.
وتضيف: "في كل عصر من العصور، شارك أشخاص عاديون في أعمال بطولية ساهمت في تغيير العالم، وهؤلاء يستحقون الاهتمام والإشادة".
يقول عبد الباري عطوان، رئيس تحرير "رأي اليوم" الإلكترونية اللندنية إنه "عندما تنشر صحيفة 'الشرق الأوسط'... أن المملكة العربية السعودية وعددا من دول مجلس التعاون الخليجي وافقت على طلب من الولايات المتحدة لإعادة انتشار قوات عسكرية برية وبحرية في مياه الخليج العربي وعلى الأرض في إطار اتفاقية ثنائية، فإن هذا التسريب يجب أخذه بكل جدية لأنه لا يمكن أن يكون إلا متعمدا، ومن أعلى الجهات الرسمية في الرياض".
ويضيف "الأهم من ذلك أن الصحيفة أكدت على أن قمة عربية محدودة ستعقد على هامش قمة إسلامية في مدينة مكة المكرمة في العشر الأواخر من شهر رمضان المبارك، مما يعني أن الحضور من الزعماء العرب الذين من المفترض ‏أن يشاركوا في القمة، سيدشنون أول اجتماع رسمي، وعلى هذا المستوى، لحلف 'الناتو العربي السني' للتحضير لأي حرب يمكن أن تشنها الولايات المتحدة وإسرائيل ضد إيران".
ويتساءل الكاتب "إذا كان الرئيس الأمريكي دونالد ترامب والمرشد الأعلى الإيراني علي خامنئي أكدا أنهما لا يريدان الحرب ولا يسعيان إليها، إذا كان الحال كذلك فمن يريدها إذا؟".
ويرى أن هناك ثلاث جهات تريد هذه ‏الحرب "الأُولى أمريكية: وتضم صقور الإدارة مثل مايك بومبيو، وزير الخارجية، وجون بولتون، مستشار الأمن القومي، وجاريد كوشنر، مستشار الرئيس وصهره، والثانية عربية: تضم العربية السعودية ودولة الإمارات العربية المتحدة، والثالثة: إسرائيل".
من جهته، يشيد إميل أمين في "الشرق الأوسط" اللندنية بـ "قرار الموافقة الخليجية على إعادة انتشار القوات الأمريكية، بطلب مباشر من الولايات المتحدة، ليعكس متانة وقوة التحالف الاستراتيجي بين واشنطن ودول المنطقة".
ويقول الكاتب "يجيء انتشار القوات الأمريكية في منطقة الخليج العربي كأداة أو وسيلة ورد فعل لمواجهة ومجابهة السلوكيات الإيرانية التي لم تتعدل أو تتبدل خلال العقود الأربعة المنصرمة، والتي أفرزت نتيجة مؤكدة، وهي أن إيران نظام يتسم بالجمود الأرثوذكسي السياسي المتحجر والمتكلس، وملالي يعيشون عصور السكولائية الاجترارية، ولا يقدرون أو يرغبون في مقاومتها، أو الخروج من جحورها، ولهذا لا وسيلة لهم في التعاطي مع العالم الخارجي إلا منطق القوة المجردة من القدرة على الفهم والحوار مع الآخر، ضمن معادلة الجميع فائز، وبعيداً عن فكرة منتصر واحد يهمين على كل الغنائم".
ويرى أن "رسالة انتشار القوات الأمريكية تؤكد للإيرانيين أن أدوات الردع العسكرية حاضرة" وأنها أصبحت "حاجة استراتيجية ملحة، سيما بعد أن باتت المصالح الأمريكية والدولية في المنطقة مهددة".
"ثقة إيرانية"
ويقول فيصل القاسم في "القدس العربي" اللندنية "قد يتصاعد الموقف الى ما هو أكثر سخونة وقد تحصل احتكاكات عسكرية في مياه الخليج أو في أي من أرجاء المنطقة، ولكن من يعتقد أن الغرب، والولايات المتحدة بشكل خاص، قد يفرطون بإيران الطائفية المصدرة للفوضى في المنطقة فهو واهم".
ويضيف "يريد ترامب اتفاقا نوويا جديدا وسيمنحه الإيرانيون ذلك، لأن السلاح النووي ليس من بين أهدافهم وسيكون عبئا أكثر منه قوة، ويريد ترامب سياسة إقليمية لا تشكل تهديدا لحلفاء الولايات المتحدة وسيكون له ذلك، ويريد ترامب تأطير التسلّح الصاروخي وسيكون له ذلك أيضا، كما سيتقاضى عن هذه المنجزات ما يشاء من الإتاوات من جيوب السعوديين وسواهم".
ويتساءل عريب الرنتاوي في جريدة "الدستور" الأردنية "من أين تأتي طهران بكل هذه الثقة؟... وهل هي ثقة حقا أم ضرب من ضروب المكابرة والعناد؟".
ويرى الكاتب أن "لدى طهران 'مجموعتين' من الأسباب تكفي كل واحدة منها لتعميق الإحساس بهذا اليقين".
الأولى "تتعلق بواشنطن، فإدارة ترامب لا ترغب في الحرب وهي غير مستعدة لها، وعام الانتخابات الرئاسية يقرع الأبواب، والتقارير المتواترة تتحدث عن ضعف في جاهزية الجيش الأمريكي لخوض غمار حرب جديدة، والحرب على إيران بحاجة لائتلاف دولي عريض، لا يبدو أن واشنطن قادرة على جمعه في ظل ضعف الحماسة الدولية لخيار الحرب".
والثانية "تتعلق بطهران ذاتها، فالدولة نجحت في بناء ترسانة عسكرية يصعب تجاهل فاعليتها وكفاءتها.. ولإيران حلفاء وشركاء وموالون في دول عديدة.. والدولة في حالة دفاع عن النفس، أي أنها ستخوض المعركة على أرضها، وليس عبر الوكلاء كما في العقود الأخيرة".