Friday, July 5, 2019

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पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में 'तहरीक-ए-लब्बैक पाकिस्तान' के धरने के ख़िलाफ़ स्वतः संज्ञान नोटिस के फैसले ने सिविल ऑर्गनाइज़ेशन के साथ सैन्य संगठनों को भी कटघरे में खड़ा कर दिया.
तहरीक-ए-लब्बैक ने इस्लामाबाद और रावलपिंडी के संगम पर स्थित फ़ैज़ाबाद इंटरचेंज पर चुनावी हलफ़नामे में 'ख़त्म-ए-नबूव्वत' के हवाले से विवादित संशोधन के ख़िलाफ़ नवम्बर 2017 में धरना दिया था जो क़ानून मंत्री ज़ाहिद हामिद के इस्तीफ़े के बाद समाप्त हुआ था.
जस्टिस क़ाज़ी फ़ाएज़ ईसा और जस्टिस मुशीर आलम की दो सदस्यी बेंच ने अपने फ़ैसले में सरकार को आदेश दिया है कि वो ऐसे फौजी अधिकारियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई करे जिन्होंने अपनी शपथ का उल्लंघन करते हुए राजनीतिक गतिविधियों में हिस्सा लिया था.
अदालत ने आर्मी चीफ़, और नौसेना और वायु सेना बल के अध्यक्षों को रक्षा मंत्रालय के माध्यम से आदेश दिया कि वो फौज के उन अधिकारियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई करें जिन्होंने अपनी शपथ को दरकिनार करते हुए किसी राजनीतिक दल या गुट का समर्थन किया था.
अदालत ने आईएसआई, मिलिट्री इंटेलीजेंस और इंटेलीजेंस ब्यूरो के अलावा पाकिस्तानी फौज के जनसंपर्क विभाग को भी हिदायत की है कि वो अपने दायरे में रहते हुए काम करें.
फ़ैज़ाबाद धरने के फ़ैसले पर जस्टिस फ़ाएज़ ईसा के समर्थन और विरोध पर वकील समुदाय बँट गया.
इस फ़ैसले पर पंजाब बार काउंसिल ने नाराज़गी का इज़हार करते हुए इन्हें हटाने की मांग की.
पंजाब बार काउंसिल ने आरोप लगाया कि जस्टिस क़ाज़ी फ़ाएज़ ईसा ने फ़ैज़ाबाद धरना केस का फ़ैसला सुनाते हुए क़ानून के बुनियादी उसूलों का उल्लंघन किया है.
बार काउंसिल का ये भी दावा था कि पाकिस्तान की फ़ौज और आईएसआई ने देश के अस्तित्व और स्थिरता के ख़ातिर चरमपंथ के ख़िलाफ़ कामयाब जंग करते हुए शहरियों की जान व माल को महफ़ूज़ करने का कारनामा अंजाम दिया है.
मगर जस्टिस फ़ाएज़ ईसा ने फौज और आईएसआई के उस महान चरित्र की तारीफ़ करने के बजाय राष्ट्रीय सुरक्षा के सिक्योरिटी एजेंसियों को बग़ैर किसी सबूत के दोषी ठहरा कर मुल्क की दुश्मन ताक़तों को पाकिस्तान की रक्षा एजेंसियों के ख़िलाफ़ प्रोपेगैंडा करने का अवसर उपलब्ध करा दिया है.
पंजाब बार काउंसिल के मांग की सिंध बार काउंसिल, हाई कोर्ट बार, कराची और मलेर बार ने निंदा की और जस्टिस क़ाज़ी फ़ाएज़ ईसा के हक़ में संकल्प पत्र मंज़ूर किया.
सिंध की बार काउंसिल ने संयुक्त संकल्प पत्र में कहा कि कुछ अनोखी ताक़तें अदालत को दबाव में लाना चाहती हैं. पंजाब बार कठपुतलियों की भी कठपुतली का किरदार अदा कर रही है जबकि सिंध का तमाम वकील समुदाय इस सैधांतिक राय के साथ खड़ा है.
पाकिस्तान बार काउंसिल ने भी पंजाब बार काउंसिल की मांग को खारिज किया और क़रार दिया कि किसी भी संस्था को अदालत की आज़ादी का खून करने की इजाज़त नहीं देंगे.
देश के मशहूर वकील और पूर्व जज जस्टिस रशीद ए रिज़वी का कहना है कि अगर जस्टिस क़ाज़ी फ़ाएज़ ईसा को हटाया गया तो 2007 से भी बड़ी तहरीक चलाई जाएगी. याद रहे कि वो तहरीक जस्टिस इफ़्तिख़ार मोहम्मद चौधरी की बहाली के लिए चलाई गई थी.
स्पष्ट रहे कि जस्टिस क़ाज़ी फ़ाएज़ ईसा ने सदर पाकिस्तान को एक पत्र लिखा है, जिसमें उन्होंने लिखा है कि उनकी जानकारी के मुताबिक़ सराकारी सूत्र कह रहे हैं कि उनके ख़िलाफ़ संविधान के आर्टिकल 209 के तहत रेफ्रेंस दायर किया गया है.
"मैं शुक्रगुज़ार रहूंगा अगर आप मुझे बता सकें कि क्या ये दुरूस्त है और अगर ऐसा है तो मुझे उसकी कॉपी उपलब्ध कराई जाए."

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