Thursday, November 21, 2019

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लेकिन यह पहला मौक़ा नहीं है जब कोई मजलिस को 'वोट काटने वाली पार्टी' कह रहा है. ऐसा ही आरोप समाजवादी पार्टी ने तब लगाया था जब ओवैसी ने उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के दौरान अपनी पार्टी से उम्मीदवार उतारे थे. महाराष्ट्र में भी कांग्रेस और एनसीपी ऐसा आरोप लगाती रही हैं.
बीबीसी मराठी सेवा के संपादक आशीष दीक्षित कहते हैं कि एआईएमआईएम को अगर आगे बढ़ना है तो उसके लिए लिए वोट काटने के इस 'टैग' से पार पाना ज़रूरी है.
वह कहते हैं, "मुसलमानों के बीच 2014 के बाद यह फ़ीलिंग आई थी और कांग्रेस ने इस तरह का प्रचार भी किया था कि एमआईएम को वोट देने का मतलब है- बीजेपी को फ़ायदा पहुंचाना क्योंकि मुसलमान वोटरों के कांग्रेस से अलग होने का फ़ायदा बीजेपी को मिलता है. हर रैली में कांग्रेस ने यह बात कही."
असदुद्दीन ओवैसी वोट काटने के इस 'टैग' को
अब तक पश्चिम बंगाल में मजलिस ख़ास सक्रिय नहीं थी मगर धीरे-धीरे उसकी सक्रियता बढ़ रही है. ओवैसी ने भी राज्य के दौरे शुरू किए हैं. ओवैसी को यहां अपनी पार्टी की सफलता की उम्मीद तो होगी मगर सिर्फ़ मुसलमान वोटों के आधार पर सफलता पाना आसान नहीं होगा.
बीबीसी मराठी सेवा के संपादक आशीष दीक्षित इसके लिए महाराष्ट्र का उदाहरण देते हैं, "एमआईएम को सोचना होगा कि अगर मुसलमानों के मन में यह बात बैठ जाती है कि ओवैसी की पार्टी को वोट देने से बीजेपी को फ़ायदा होता है तो फिर मुश्किल होगी. वे एक ही हाल में एमआईएम को वोट दे सकते हैं जब वह पार्टी कमज़ोर हो जाए जिसे वे वोट देते रहे हैं. उदाहरण के लिए महाराष्ट्र में अब कांग्रेस और एनसीपी की स्थिति 2014 से मुक़ाबले बेहतर हुई है. तो मुसलमानों को अगर लगता है कि वे जीतने की बेहतर स्थिति में हैं तो आगे मजलिस के लिए महाराष्ट्र में चुनौती बढ़ जाएगी."
जिस शैली में ममता बनर्जी ने एआईएमआईएम पर निशाना साधा है, उसके आधार पर अगर वह यही बात पश्चिम बंगाल के मतदाताओं के मन में बिठाने में सफल हो जाती हैं तो ओवैसी को मुश्किल हो सकती है.
मगर अभी चुनावों में डेढ़ साल का समय है. सबकी निगाहें इस पर होंगी कि ओवैसी इस चुनौती पार करके तृणमूल कांग्रेस और बीजेपी के लिए चैलेंज बन पाते हैं या नहीं.
हटाने की कोशिश भी कर रहे हैं. वह कई बार कह चुके हैं कि लोकसभा चुनाव और अन्य राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों में उनकी पार्टी के उम्मीदवार नहीं थे, फिर भी बीजेपी विरोधी पार्टियों की हार हुई. इसलिए यह कहना ग़लत है कि एआईएमआईएम के कारण बीजेपी को फ़ायदा पहुंचता है.
ममता बनर्जी पर भी उन्होंने इसी लाइन पर निशाना साधते हुए सवाल पूछा है कि 2019 के लोकसभा चुनाव में मैंने पश्चिम बंगाल में उम्मीदवार नहीं उतारे थे, फिर बीजेपी को 18 सीटें कैसे मिल गईं?
वरिष्ठ पत्रकार उमर फ़ारूक़ कहते हैं, "वोट काटने के सवालों पर ओवैसी खुलकर कहते हैं कि सेक्युलर पार्टियां, जिनमें कांग्रेस भी शामिल है, वे अपने हिंदू सेक्युलर वोट बैंक को भी अपने साथ नहीं रख पाईं. वह कहते हैं कि इन पार्टियों को सिर्फ़ इस बात की चिंता है कि मुसलमान उन्हें वोट देते रहें. ओवैसी का सवाल है कि जब आप उन्हें अपने साथ नहीं रख पा रहे तो क्या मुसलमानों ने आपको लिखकर दे रखा है कि वो हमेशा आपको वोट देंगे?"